१३नवम्बर ९७ की गुनगुनी सी दोपहर निश्चय ही शुभ थी जब महिलाओं की रचनात्मक उर्जा को एक नईदिशा ,नए आयाम देने के उद्देश्य से इंदौर जैसे महानगर मे अनेकों किटी पार्टियों वाले क्लबों एवं सामाजिक संस्थाओं से अलग एक सृजनात्मक अभिरुचि की संस्था के रूप मे इंदौर लेखिका संघ की नींव रखी .आज लगभग १३साल से यह संस्था निरंतर संचालित होरही है .संघ की उपलब्धियों में सबसे अहम् यह की वे जो केवल लिखने की इच्छा करती थी वे भी इसके बेनर तले आज जम कर लिख रही है .पत्र -पत्रिकाओं मे स्थापित लेखन कर रही है ।







आज जब साहित्य हाशिये पर जा रहा है .इलेक्ट्रोनिक मिडिया के
बड़ते प्रभाव मे जब आम आदमी की साहित्य मे रूचि कम होने का खतरा बना हुआ है ऐसे संक्रमण काल मे साहित्य मे रूचि जगाने कही उद्देश्य लेकर चले थे सबके सहयोग ,सगठनं की भावना ही सफलता के मूल मंत्र मेरची बसी है .इस दृष्टी से लेखिका संघ समृध है यही हमारे उद्देश्य की सार्थकता भी है --------------------------स्वाति तिवारी







संस्थापक ,इन्दोर लेखिका संघ







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बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

बन्द मुट्ठी




आज सुबह से ही सामने वाला दरवाजा नहीं खुला था। अखबार बाहर ही पड़ा था। 'कहीं चाची....? नहीं, नहीं.....' मैं बुदबुदा उठती हूँ।

एक अनजानी आशंका से मन सिहर जाता है, पर मैं इस पर विश्वास करना नहीं चाहती....। मन-ही-मन मैं सोचती हूँ, 'रात को तो बच्चों को बुला रही थीं।' मन में शंका फिर जोर मारती है, 'इस उम्र में, पलक झपकते कब, क्या हो जाए? हो सकता है, रात देर से सोई हों और नींद न खुली हो?' मैं आश्वस्त होने की कोशिश करती हूँ, 'पर रोज सुबह पाँच बजे से खटर-पटर करने लगती हैं।' मन में शंका का बीज फिर प्रस्फुटित होता है, गैस पर चाय का पानी चढ़ा इन्हें आवाज देती हूँ।

''सुनो! उठो ना! सामने वाली चाची अभी तक नहीं उठी हैं।''

''ऊँहूँ, मुझे नहीं, तो चाची को तो सोने दो, बेचारी का बुढ़ापा है।'' ये फिर करवट बदल लेते हैं।

''नहीं! मुझे लगता है, कुछ गड़बड़ है।'' मैं सशंकित स्वर में बोलती हूँ।

''नहीं उठीं तो मैं क्या करूँ? जब उनके बच्चों को उनकी परवाह नहीं है, तो तुम क्यों सारे जमाने का ठेका लेती हो! सोने दो, रविवार है।'' ये रजाई खींच मुँह ढँक लेते हैं।

''आज रविवार नहीं, शनिवार है जनाब!''

मैं कुढ़-कुढ़ाकर किचन में आ चाय केतली में भरकर रख देती हूँ और अपना प्याला हाथ में ले अखबार के पन्ने डाइनिंग टेबल पर फैलाती हूँ। पर मन अखबार में नहीं लगता, रह-रहकर चाची के दरवाजे की आहट लेता है। मन है कि मानता ही नहीं और प्याला हाथ में ले उनके दरवाजे की बेल का बटन दबा देती हूँ।

बेल की सुमधुर ध्वनि सुनकर याद आता है, चाची बता रही थीं, इतनी मधुर ध्वनिवाली कॉलबेल उनके बेटे ने फॉरेन से भेजी थी। बेल बन्द होते-होते कराहती आवाज सुनाई दी तो राहत की साँस ली। थोड़ी देर बाद चाची ने दरवाजा खोला।

व ेचल नहीं पा रही थीं और तेज बुखार से तप रही थीं।

''अरे! चाची, तुम्हें तो तेज बुखार है? बताया क्यों नहीं।'' मैंने अधिकारपूर्वक उन्हें उलाहना दिया और सहारा दे, पलंग तक ले गई। वे थरथरा रही थीं। मैंने उन्हें रजाई ओढ़ा दी और केतली में से आधा गिलास चाय लाकर दी।

उनकी आँखें नम थीं और कृतज्ञता जाहिर कर रही थीं। उन्हें लिटाकर आई और क्रोसीन की टेबलेट ढूँढने लगी। दवाइयाँ यूँ तो जब-तब, जहाँ-तहाँ हाथ में आ जाती हैं, पर जरूरत हो, तब ढूँढ-ढूँढकर थक जाओ, नहीं मिलतीं। याद आया, बच्चों की पेरासिटामोल सिरप रखी है। अभी दो-तीन चम्मच वही दे देती हूँ, कुछ तो राहत मिलेगी और फिर कम से कम साइकोलाजिकल असर तो करेगी ही। फिर बुढ़ापा भी तो बचपन की पुनरावृत्ति ही है। सोचते हुए उन्हें दवाई दे आई।

घर के सुबह के काम, बच्चों का टिफिन वगैरह निपटाकर देखा बुखार कुछ कम हुआ, पर ठण्ड भी तो कड़ाके की पड़ रही है। मैंने अपने रूम का रूम-हीटर चाची के कमरे में लगा दिया। वे राहत महसूस करने लगीं।

चाची पर दया आ रही थी। बेचारी करें भी क्या? बताती हैं, चाचा के मरने के बाद ये फ्लैट खरीदा है, तभी से फ्लैट में अकेली पड़ी हैं। एक बेटा कहीं विदेश में है और बेटी कलकत्ता में। बेटा-बहू नौकरी करते हैं, उनके पास समय भी नहीं रहता। फिर वहाँ विदेश में मेरा मन लगेगा क्या? यह कहकर वे बात हमेशा खत्म कर देतीं।

कभी-कभी भावुक क्षणों में बोल जाती हैं, ''ये तो अच्छा हुआ, पति ग्रेच्युटी का रूपया और पेंशन छोड़ गए, जो आसरे के लिए पर्याप्त है।'' पर क्या जीने के लिए केवल यही चाहिए? आज रह-रहकर मुझे यही दार्शनिकता सूझ रही थी, ''क्या रखा है जीवन में। मरते-खपते बच्चे बड़े करो और अन्त में इस पीड़ा के साथ? क्या रखा है बुढ़ापे में? सूर्यास्त की तरफ बढ़ते जीवन सन्ध्या के दौर से गुजरते हुए परिवार की उपेक्षा का जहर? क्या नियति केवल आँगनभर धूप,खिड़की भर आकाश ही होती है?''

अक्सर महसूस करती हूँ, चाची अपने अकेलेपन को बाँटना चाहती हैं। कभी मेरे बच्चों के साथ, कभी ऊपरवाले फ्लैट के बच्चों के साथ। कभी महरी को बुलाकर, कभी टीवी चलाकर। पर आजकल के बच्चों के पास वक्त कहाँ है? कॉन्वेण्ट में पढ़ने वाली यह पीढ़ी कम्प्यूटर युग की जनरेशन है, इसके पास रिश्तों की मिठासवाला अहसास कहाँ है? अपनी ही नानी, दादी के साथ बैठ लें, तो बहुत; बेचारी चाची तो सामने वाले फ्लैट में रहती है। बच्चे अक्सर मुझे भी सलाह देते हैं; ''मम्मा, लाइफ में भावुकता नहीं चलती! वक्त कहाँ है इतना कि दूसरों के रोने रोते रहें?''

मैं अपना बचपन एक बड़े कुटुम्ब में बिताकर आई थी। पल-पल पर ममता की छाँव तले, सुरक्षा की छत्रछाया में प्यार और विश्वास के हाथ सिर पर रखे हुए। अम्मा, दादी, चाची, बड़ी माँ, बुआ सब रिश्तों की महक मेरे मन में अभी भी रची-बसी है। किसी ने बालों में तेल डाला होता, तो दूसरे ने पकड़ चोटी गूँथी होती थी। दादी का हलवा, चाची की खीर ऐसे व्यंजनों का स्वाद चखा था, पर मेरे बच्चे नौकरीवालों के घर के एकाकीपन में पल रहे थे।

चाची के लिए दोपहर मेंे मैं पतली खिचड़ी बनाकर दे आई थी। उनकी आँखों से लगातार पानी बह रहा था। मैं समझ नहीं पा रही थी कि यह पानी है या आँसू! ''चाची, आँखों में जलन है क्या?''

मेरे प्रश्न पर वे मुस्करातीं, ''नहीं रे!''

उनके ''नहीं रे!'' में न जाने क्या था? कैसी पीड़ा का अहसास! मुझे भी रूलाई आने लगी। कहाँ चला जाए यह बुढ़ापा? क्या ऐसा कुछ उपाय नहीं कि यौवन को चिरस्थायी बनाया जा सके? कितना दर्द, कितनी तकलीफें इस बुढ़ापे में, बीमारी है, अकेलापन है। क्यों हम जन्मदिन पर बधाइयाँ और दुआएँ देते हैं, जबकि हम हर जन्मदिन के बाद बुढ़ापे के करीब होते जाते हैं।

बुढ़ापे का जो जहर पड़ोसन वृद्धा पी रही हैं, उसी की काट मैंने खोजी थी, उन्हें चाची कहना शुरू करके। फिर तो वे पूरी मल्टी में चाची के रूप में लोकप्रिय हो गईं। हम पाँच-सात घरों में बड़ा अपनापन है। दोपहर में कभी चाची के घर जा बैठते, कभी रामायण का पाठ रख लेते, कभी कुछ नया व्यंजन बनता, तो चाची का हिस्सा भी निकाल लेते। पर क्या हम पड़ोसी उस आत्मा के अकेलेपन को भर सकते हैं? हाँ, कुछ पूर्ति सम्भव है, पर रिक्तता का अहसास बड़ा घातक होता है। जो कहीं न कहीं अपने चिह्न छोड़ ही देता है। हमारी आवाजाही चाची में उत्साह भरती रहती। वे जी खोलकर सबकी आवभगत करती रहतीं, पर एकान्त क्षणों में अकेलेपन की पीड़ा उन्हें सालती ही होगी।

महरी को वे अक्सर रोकना चाहतीं। कभी घुटनों में तेल मलवाने के बहाने,तो कभी किसी और बात से। पर आठ-दस घरों में काम से बँधी वह इतनी चालाकी से निकल भागती कि उसकी चतुराई की दाद देनी पड़े।

बुखार उतरते-उतरते हफ्ता भर लग गया, पर चाची इस एक हफ्ते में बिल्कुल बदल गईं। अब वे अपने फ्लैट के बाहर कुर्सी डाले बैठी रहती हैं, हर आते-जाते को रोकती-टोकती, ''अरे भाई तुम कौन हो?'' ''किसके घर जा रहे हो!'' ''इतनी सुबह-सुबह चल दिए शर्माजी?'' ''अरी ओ प्रतिभा! कल तो तू बड़ी देर से घर लौटी? कहाँ चली गई थी, मुझे तो चिन्ता खाए जा रही थी।''

चाची अपनत्व से कहतीं, पर प्रतिभा को यह नजर रखनेवाली टोका-टोकी पसन्द नहीं। वह मुँहफट झट से कहने लगी, ''आपको चिन्ता करने की क्या जरूरत है। मैं तो अपनी माँ को बताकर गई थी।''

ऐसे कितने प्रश्न कितनों से पूछतीं और टके से जवाब पातीं। इसके बाद लोग चाची का सामना करने से कतराने लगे। मेरा दरवाजा उनके सामने पड़ता था। उनकी इस हरकत पर मुझे कभी तरस आता, तो कभी क्रोध। धीरे-धीरे बिल्डिंग में उनकी उपेक्षा होने लगी और वे एक बार फिर अकेली डिप्रेशन में रहने लगीं। उन्होंने फिर कमरे में बैठ चुपचाप टीवी देखना शुरू कर दिया। सोचती हूँ कैसी अनकही पीड़ा है? कैसे झेलती होंगी चाची इस दंश को? मैं तो परिवार की एक क्षण की उपेक्षा नहीं बर्दाश्त कर सकती, पर कल किसने देखा? बण्टी और बबलू भी मेरे प्रति ऐसा उपेक्षित व्यवहार करेंगे तो? सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

क्षितिज पर खड़ी वे, अपनत्व को तरसतीं, सूनी-रिक्त आँखें लिए, जाने क्या ढूँढती रहती! मैं अकेली कितना साथ देती? सोचती एक दिन वे अस्ताचल की ओर चली जाएँगी। सिहरन-सी होती उनके बारे में सोचकर। मैं झट से भगवान को हाथ जोड़ने लगती हूँ, ''हे भगवान! मुझे बुढ़ापे के पहले ही उठा लेना। यूँ अकेले होने का कारावास मुझे एक पल को भी नहीं चाहिए। पति के सामने उनके कन्धों पर चली जाऊँ? तो बेटे-बहुओं पर भार तो नहीं बनना पड़ेगा।''

लगभग पंद्रह दिनों बाद चाची ने फिर बिस्तर पकड़ लिया। इस बार लकवे का अटैक था। अब और मुश्किल हो गया था उनके लिए। मल्टी के लोग साथ दे रहे थे। बारी-बारी से सब ड्यूटी करते। महरी की जगह फुलटाइम बाई की व्यवस्था करवा दी। चाची अब भी चुप ही रहती थीं। उनकी झुर्रियों से सिमटकर छोटी हो गई आँखें, अब निर्विकार होकर भी किसी के इन्तजार में रहतीं। एक दिन मैंने कंघी करते वक्त पूछा, ''चाची! बेटे को खबर तो करने दो, क्या सोचेंगे वे लोग, कैसे पड़ोसी हैं? माँ की खबर तक नहीं करते।'' पर वे टाल गईं, ''क्या कर लेगा आकर। उसका पता मुझसे गुम हो गया है।''

मुझे लगा, उनका कोई बेटा-वेटा नहीं है। वे केवल हम लोगों की दया से बचने के लिए बेटे के होने की बात करती रहीं। खैर, जो भी हो, तीन बजे की चाय का प्याला ले चाची के पास पहुँचती हूँ, तो प्याला हाथ में देख उनके चेहरे की तलब बेचैन कर देती है। उन झुर्रियों में अपने बुढ़ापे का स्वरूप तलाशने लगती हूँ। चाची चाय सुड़ककर मुझे लम्बी उम्र का आशीर्वाद देती हैं। पर लम्बी उम्र किसके लिए? यही प्रश्न मुझे विचलित करने लगता है। रात को चाची की साँस उखड़ने लगी। ये डॉक्टर को बुलवा लेते हैं।

''कुछ कहा नहीं जा सकता। इनकी स्थिति गम्भीर है। आप इनके बेटे को सूचना दे दीजिए।'' डॉक्टर का यह कहना हम बिल्डिंग वालों के लिए चिन्ता का विषय था।

''बेटे के आने तक अगर कुछ हो गया तो?'' मिसेस शर्मा का प्रश्न था।

''सूचना के बाद अमेरिका से आने में भी तो समय लगेगा।'' मिस्टर शर्मा ने चिन्ता जाहिर की।

चौथे माले के पाण्डेजी ने सलाह दी, ''इनकी डायरी-वायरी में ढूँढते हैं पता। सूचना तो देनी ही होगी?'' शायद चाची सबके चेहरे के भाव समझ रही थीं। उन्होंने बुदबुदाकर कहा, ''तुम सभी मेरे बच्चे हो। मुझे विद्युत शवदाह गृह में दे देना।''

''उनकी पेटी में देखें, शायद किसी रिश्तेदार का अता-पता चल जाए।'' मेरी बेटी ने सलाह दी। पर चाबी नहीं मिली और रात तीन बजे चाची चली गई। उनके जाने के बाद तकिए के नीचे चाबी मिली। पेटी खोली, उसमें कुछ कपड़ों, कुछ रूपयों के अलावा, एलबम रखे थे। एलबम खोलकर देखे जाने लगे। एक खूबसूरत गौरवर्णी माँ अपने बच्चों के साथ तरह-तरह की मुद्रा में मिली। फिर बड़े होते बच्चों के साथ प्रौढ़ होती वही महिला पहचान में आने लगी। अरे, ये सब तो चाची के ही फोटो हैं। कुछ फोटो खुद के, कुछ पति के, कुछ बच्चों के। एक एलबम और था, उनके बेटे की शादी का, खोला तो चौथे मालेवाले पाण्डेजी उसे पहचानते थे, ''अरे, यह तो मेरी ब्रांच में ही काम करता है। आजकल ब्रांच मैनेजर है, अच्छा इसका फोन नम्बर दफ्तर से ले लेते हैं। एलबम आगे देखा गया। स्पष्ट हुआ कि वह ब्रांच मैनेजर चाची का बेटा है। कुछ खरीद के बिल भी थे पेटी में। वे उन्हीं वस्तुओं के थे, जिन्हें बताकर चाची कहा करती थीं, ''ये मेरे बेटे ने अमेरिका से भेजी है।'' सारे राज खुल गए थे। एक बन्द मुट्ठी की तरह, जो खुल गई, तो खाक की कहलाती है और बन्द थी, तो लाख की, पर चाची तुम्हारी मुट्ठी सदा बन्द रही और खुली भी, तो खाक नहीं हुई। उसमें बन्द था एक माँ का आत्मसम्मान।

''तो चाची का नालायक बेटा यहीं रहता है?'' शर्माजी बोले।

''हाँ, पर अब क्या करें? खबर दें?'' पाण्डेजी ने सवाल किया। चाची की पेटी में एक डायरी भी मिली, कुछ यादों को समेटने वाली। बेटे को सूचना दे दी गई। शववाहन भी आ गया था। बेटे के आने तक एक अन्तराल पसरा था कमरे में। जहाँ थी चाची की डैड बॉडी और हवा में तैरता एक प्रश्न....क्या चाची के बुढ़ापे को अकेलेपन से बचाया जा सकता था? डायरी के पन्नों पर फरफराता है एक उत्तर, ''बेटे, कल तुम्हारा भी आएगा बुढ़ापा। यह कड़ी यूँ ही चलती रहेगी। सूई के पीछे धागा लगा रहता है।'' पर सब स्तब्ध थे, एकदम मौन.....। परदे की सरसराहट से लगता रहा कि अब कोई आया.....शायद अब....।











डॉ. स्वाति तिवारी

ई-एन1/9, चार इमली

भोपाल (म.प्र.)

फोन-094240-11334





मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010



सारा शहर ही उसकी गिरफ्त में था और हम शहर में। पानी में रह कर मगरमच्छ से बैर नहीं लेना चाहिए, हम अच्छी तरह से जानते हैं। लेकिन मगरमच्छ ही आगे होकर आपसे बैर लेना चाहे, तो ? और वही हुआ। हम भी उसकी चपेट में आ ही गए। वहीं सर्दी-खांसी, बुखार, जब हवा ही प्रदूषित हो तो बचकर कहाँ जाइएगा। वैसे तो इन छोटी-मोटी बीमारियों की परवाह ही कब रहती है ? आती हैं, सँभले-सँभले तब तक तो चली भी जाती है। जैसे नेताजी का तूफानी चुनावी दौरा हो। लेकिन इस बार लगता था ठहरने के इरादे से ही आई थी। एक स्थायी गठबंधन सरकार की तरह। हाँ, तीन दलों का गठबंध नही तो था - सर्दी, खांसी और बुखार। हमने भी विपक्ष के नेता की तरह, उनके खिलाफ अविष्वास प्रस्ताव लाने का मन बनाया और डॉक्टर के पास चले।

क्लीनिक पहुंचकर पता चला, डॉक्टर साहब नहीं हैं। कोई इमरजेंसी थी, वहीं गए हैं और पता नहीं कब आएंगे। अब भई, इमरजेंसी है यह तो। सोचा, जब टैक्सी में इतना किराया लगा कर आए हैं, तो कुछ इंतजार ही कर लिया जाए ताकि दुबारा आने का खर्चा न हो। मगर वहाँ काफी भीड़ थी। बताया न, सारा शहर ही उसकी गिरफ्त में था। सो, बैठने के लिए भी कोई जगह खाली नहीं बची थी। कुछ देर तो सहा, लेकिन खड़े भी कब तक रहा जा सकता था। तभी याद आया कि पास में ही तो सिंग साहब का बंगला है, क्यों न वहीं चल कर बैठा जाए कुछ देर। मेल-मुलाकात भी हो जाएगी और शायद डॉक्टर साहब भी आ जाएँ तब तक।

चल तो दिए, लेकिन इन बंगलों में जाना हमें पसंद नहीं। ना, उनकी भव्यता से आतंकित नहीं होते हैं। ये आडंबरपूर्ण खोखली ऊँचाइयाँ भला हमारे मनोबल को क्या खाक गिराएंगी। दरअसल बात यह है, कि बंगला है तो एक अदद कुत्ता भी होगा वहाँ। ना-ना, डर तो उसका भी नहीं। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा ? काट लेगा, यही न । तो लगवा लेंगे इंजेक्षन, जितने भी लगें, और क्या ? वो टेंषन नहीं है। प्रॉब्लम तो यह है, कि वो आपको चारों ओर से सूंघ-सांघ कर आपके इर्द-गिर्द कूदा-कादी करता रहता है। आपको चेहरे पर बड़ी सौम्यता दर्षाते हुए निहायत ही नफासत से कोमल-मीठी आवाज में बोलना पड़े कि - नो-नो, नहीं-नहीं, हटो-हटो या फिर सिट-सिट, गो-गो। पता नहीं क्यों, कुत्तों को देखते ही मुंह से अंगरेजी झरने लगती है। जबकि इधर आपका बड़ा मन कर रहा है, कि एक जमा ही दें कसकर पीछे से, ताकि चला ही जाए प्याऊँ-प्याऊँ करता हुआ। आखिर कुत्ता है तो कुत्तों की तरह ही रहे न।

सोचते-विचारते चले जा रहे थे, कि हमने स्वयं को सिंग साब के गेट पर खड़े पाया और भों-भों की आवाज से हमारी विचार श्रृंखला टूटी। वही हुआ, जो सोच रहे थे। हमें देखते ही एक कददावर कुत्ता भौंकता हुआ हमारी और लपका। हालांकि हम सुरक्षित थे, क्योंकि गेट के इस पार थे और गेट बंद था। आवाज सुनकर उसके मालिक सिंग साब बाहर निकले। उन्हें देख वह पहले तो उनके कदमों में लोट गया, फिर उठ कर अगले दो पंजे उठाकर उनकी छाती पर टिकाए और मुंह चाट गया। हमें बड़ी जोर की उबकाई आई। वे वही - ''नो-नो, नॉटी बॉय'' कहते हुए गेट तक आए और हमें अंदर आने को कहा।

हम अंदर आए, वह अब भी हमारे चारों ओर चक्कर काटता, कभी आगे कभी पीछे आ-जा रहा था। मिसेस सिंग पूजा गृह में थी। बैठक में आ कर बैठते ही शुरू हो गया उनका कुकुर पुराण - ''बड़ा ही नॉटी है टैंगो। मेरे बिना तो रहता ही नहीं। खाना खाएगा तो मेरे हाथों से ही नहाएगा तो मेरे साथ। बिस्तर है उसका बकायदा, लेकिन रात में मेरी रजाई में ही घुसकर सोएगा।''

हमारा जी मिचलाया और हमने पेट से उठी उस लहर को छींक का रूप देकर नाक, मुँह ढँकते हुए ''सारी'' कहा।

वे आगे बोले- सुबह-सुबह उठा देता है, फिर घुमाने ले जाओ। और ये सोफा (जहां हम बैठे थे) तो उसकी पसंदीदा जगह है। टी.वी.चलता रहता है, तो यहीं बैठता है।''

हमें लगा सैकड़ों कीटाणु हमारे शरीर पर रैंग रहे हैं। सोफे पर तो बैठे ही थे, जमीन पर हमारी साड़ी दबा कर वह बैठ चुका था। उसकी इस असहजता को हमने खाँसी में बदल दिया। सोचा जाकर नहाना पड़ेगा, रात में ही, फिर चाहे तबीयत खराब ही हो जाए और भी। और साड़ी तो देनी ही होगी ड्रायक्लीन के लिए।

''इतना-सा था, जब लाए थे'' - उन्होंने दोनो हाथों को एक के ऊपर एक कुछ ऊँचाई पर गोल करते हुए, जैसे हाथों के बीच ऊन को गोला हो, उसका पहले का आकार बताया। काफी बड़ी रकम खर्च करनी पड़ी, दस-बारह हजार के लगभग। आखिर है भी तो विषुद्ध नस्ल का। यू.के.के. क्लब से जुड़ा हुआ, जिसकी ब्रांचे इंडिया में भी हैं। सारे पेपर कम्पलीट है इसके, प्रमाण के लिए।''

हम अंदर के गुबार को रूमाल से नाक - मुँह दबाए सुन रहे थे। सर्दी-खाँसी की उपयोगिता पहली बार समझ में आई। इस बहाने आप बहुत कुछ ढँक दबा सकते हैं। गला खराब होने का अच्छा बहाना था ही, सो हूँ-हाँ से भी मुक्ति।

''बकायदा इंस्ट्रक्षन दिए थे उन्होंने। एक पूरी बुकलेट आती है, कि इसे कैसे ट्रीट किया जाए। जैसे, कि यह आपके प्यार और सामीव्य का भूखा है। आपका अच्छा सहचर साबित हो सकता है। सर्दी-गर्मी में इसका विषेष ध्यान रखा जाए। आखिर विदेषी है न, तो ज्यादा गर्मी बर्दाष्त नहीं कर पाता। सो, गर्मियों में इसके लिए कूलर की विषेष व्यवस्था रहती है। ठंड भी यदि ज्यादा हो, तो हीटर भी ऑन करना पड़ता है। वैसे तो पूरा बिस्तर है उसके लिए अलग से। जमीन पर सोने से ठंड लग जाती है। इतना बचाकर रखने पर भी, कभी गलती से ठंडा पानी वगैरह पी लेने से, ठंड में एकाध बार तो इसे सर्दी जुकाम हो ही जाता है। तुरन्त डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता है। वैसे भी रेगुलर चेकअप के लिए ले जाते ही रहते हैं। सारे डोज, टीके, दवाइयाँ वगैरह समय पर करते रहते हैं। नहाने के लिए विषेष शैम्पू, टब, टॉवेल, टेल्कम पावडर, कंघी वगैरह हैं। सर्दियों में तो गर्म पानी में नहला कर, टॉवेल में लपेट पर कंघी करते हैं। बाल, नाखून भी छाँटते-काटते रहना पड़ता है। खाने-पीने का भी पूरा ध्यान रखते हैं कि पूर्णतः पौष्टिक, संतुलित आहार हो। दूध-ब्रेड,बिस्किट,नॉनवेज, अब तो सब कुछ खा लेता है। बस, खिलाना पड़ता है अपने हाथों से। जब तक हथेली पर रखकर न खिलाएँ, कुछ खाता ही नहीं। जब छोटा था, दांत भी नहीं थे पूरे तो दूध-दलिया वगैरह देना पड़ता था। दलिया भी स्पेषल बनता था इनके लिए। दाले-सब्जियाँ डालकर, ताकि भरपूर प्रोटीन-विटामिन-मिनरल्स मिल सकेंे। बड़े प्यार और लगन मेहनत से पाल-पोस कर बड़ा किया है इसे। एक-एक इंस्ट्रक्षन का अक्षरषः पालन करते हुए।'' और वे प्यार से उसे सहलाने लगे, जो उचककर उनकी गोद में बैठ चुका था। उसके बालों में अँगुलियाँ फिराते हुए उनकी आँखों और चेहरे पर वात्सल्य का नियाग्रा झर रहा था।

तभी उलझे बालों, टखनों से ऊँची साड़ी पहने, एक तेरह-चौदह वर्ष की लड़की, अपने रूखे-खुरदरे हाथों से पानी की टे्र लेकर आई, जो निष्चित ही उनकी नौकरानी थी। पानी की मुझे सख्त आवष्यकता थी, इतनी घुटन के बाद। मैंने झट से पानी का गिलास उठा लिया।

उन्होंने उसे चाय बनाने का आदेष दिया और फिर बोले - ''यह हमारी नई नौकरानी है। अब इतने बड़े घर में एक सर्वेंट तो चाहिए ही। तो, इसे रख लिया पूरे समय के लिए। पहले बर्तन वाली, कपड़े वाली सब अलग-अलग थीं। एक का इंतजार करो, फिर दूसरी का इंतजार, दिन भर इंतजार, कोई आए, कभी कोई न आए। सबका अलग-अलग वेतन, तो खर्चा भी ज्यादा। इस सारे झंझट से मुक्ति पाने के लिए, उन सबकी छुट्टी कर, इस एक को रख लिया है। चौबीसों घंटों के लिए। यहीं रहती है, काम करती है। कुछ लोग हैं, जो बिहार आदि दूरदराज के क्षेत्रों से बच्चों को ले आते हैं, मजदूरी के लिए। उन्हें डेढ-दो हजार दिए थे कमीषन। उन्होंने ही बताया कि इसके बैंक खाते में चार-पांच सौ रूपए महिना डालते जाना। फटे-पुराने कपड़े दे देना पहनने को और खाने को मोटा चावल। खूब डटकर काम कराना सख्ती से। सुबह से देर रात तक। नर्मी, दया बिल्कुल नहीं दिखाना, वर्ना सिर पर चढ़ जाएगी। तो सुबह पांच बजे से रात दस बजे तक काम करती रहती है लगातार। मोट चावल इसके लिए अलग से लाकर रख दिए हैं। सुबह-षाम एक-एक गिलास नापकर दे देते हैं, उबाल कर खा लेती है। बरामदे में टाट डालकर सो जाती है। कभी-कभार तबीयत खराब होने का बहाना भी करती है, मगर हम ऐसे नखरों पर ध्यान नहीं देते।'' उनके चेहरे पर ऐसे संतुष्टि के भाव थे, जो एक बड़ा फायदे का सौदा पटा लेने पर होते हैं, खुर्राट व्यवसायी के चेहरे पर।

इधर हम सोच रहे थे, कि वे इंस्ट्रक्षन के तो पक्के हैं, पूरे।

तब तक वह चाय ले आई थी। हमारे मुँह का स्वाद तो पहले ही कड़वा हो चुका था, फिर भी चाय तो पीनी ही थी, षिष्टाचारवष। चाय पीते हुए हमारी नजर चलते हुए टी.वी. पर पड़ी। एक विज्ञापन आ रहा था, जो बता रहा था, कि किस तरह आदमी कुत्तई पर उतर आता है - ''टेस्ट का पॉवर'' के चलते। यह ''टेस्ट'' कोई भी हो सकता है - सत्ता का, धन का, शक्ति का, अहं का, सिर्फ किसी एक बिस्किट विषेष का ही नहीं।

















सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

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रविवार, 17 अक्तूबर 2010

कला-साहित्य

ठहरी हुई ज़िंदगी
कितना अजीब पेशा है डॉक्टरी का भी। इच्छा हो न हो यदि आप ड्यूटी पर आए हैं तो आपको अपनी इच्छा पर नहीं पेशेण्ट की हालत के अनुसार चलना होता है। सुबह से ही पवन से कह दिया था कि आज चाहे जो हो जाए वह घर समय पर पहुँचे मुझे शॉपिंग पर चलना है पर कहाँ उठ पाई मैं समय पर? पवन फोन पर फोन कर रहे थे। चार बार एस.एम.एस. भेज चुके थे। ज़रूर मजाक उड़ाएँगे मेरा, ''डॉक्टरनी मेडम शॉपिंग नहीं करनी थी तो खामखाँ मेरा दिन क्यूँ बिगाड़ा?''
''क्या करती मैं भी?''
क्लिनिक में उस रोज कुछ ज्यादा ही भीड़ थी। मैं थक गई थी। पेशेण्ट देखते-देखते यूँ तो हर रोज ही समझो यही हाल रहता है पर आज अपेक्षाकृत कुछ ज्यादा मरीज थे और मेरा पेशेण्ट देखने का समय भी समाप्त हो चुका था। एक घण्टा ऊपर हो गया था।
लास्ट पेशेण्ट बाहर बैठी थी। मैंने राहत की साँस ली थैंक गॉड चलो अब फुर्सत हुई। लास्ट पेशेण्ट उठकर मेरे पास आई। उसकी आँखों में अजीब-सी वितृष्णा दिखाई दी मुझे। ऐसी वितृष्णा तो उसी की आँखों में होती है जो खुद से ही नफरत करता है। उसके उठने-बैठने के ढंग में भी वह मुझे असामान्य दिखाई दे रही थी। उसने रजिस्ट्रेशन की पर्ची मेरे सामने रखी।
''क्या हुआ तुम्हें?''
वह कुछ बोल नहीं याचक की तरह मेरी तरह मेरी तरफ देखने लगी थी।
मैंने फिर कहा, ''क्या बीमारी है यह तभी बताया जा सकता है जब तुम अपनी तकलीफ बताओगी।'' उसने फिर साड़ी के पल्लू में चेहरा छुपा लिया। इस बार वह रो रही थी।
मैं उठकर उसके पास गई, ''अच्छा चलो उठो जाँच करती हूँ।'' वह उठकर बैड पर लेट गई फिर जो तकलीफ उसने बताई उसके लिए कई तरह के मेडिकल टेस्ट जरूरी थे। मैंने केस रिसर्च सेन्टर को रिकमेण्ड कर दिया था, मेडिकल जाँच के लिए। रिपोर्ट लेकर वह चार दिन बाद मेरे पास आई। जाँच की रिपोर्ट देखने के बाद मैंने ध्यान से उसके चेहरे की ओर देखा था, आज चेहरा निर्विकार था। फिर कुदरत किसी चेहरे पर तो नहीं लिखती कि वह कौन है? उसका पेशा क्या है? किस जात, किस धर्म की बेटी है? मैं उसके चेहरे पर कुछ नहीं पढ़ पाई। हाँ मेडिकल रिपोर्ट के कागज उसकी कहानी तो नहीं पर पेशा बयान कर रहे थे। मेडिकल जाँच में पाया गया कि वह औरत ''एड्स'' जैसी खौफनाक और जानलेवा बीमारी से ग्रसित है। मैंने उसे अस्पताल में उपचार के लिए भर्ती किया। अब वह थोड़ी राहत महसूस कर रही थी। एक सप्ताह तक तो उसके प्रति मन में उठने वाली प्रतिक्रिया अच्छी नहीं थी मेरा व्यवहार भी उसके प्रति उपेक्षापूर्ण ही था।
जैसे-जैसे लोगों को पता चली कि वह एड्स जैसी जानलेवा बीमारी से ग्रस्त है अस्पताल में नर्सों का भी उसके प्रति तिरस्कृत व्यवहार था। वे उसके पास ज्यादा देर तक रूकना पसन्द नहीं करती थीं। यूँ तो सब जानते हैं कि यह कोई ऐसी बीमारी नहीं जो छूने से फैलती है या पास जाने से ही आप को पकड़ लेगी पर एक अनजाने भय के आगे हर व्यक्ति डरता है। फिर यह तो बदनामी भी देने वाली बीमारी है। मरीज को खाना देने वाला कर्मचारी भी दूर से ही थाली सरकाकर चला जाता था। बीमारी के बारे में शायद अब उसे भी अहसास हो गया था। वह उदास और मायूस पड़ी रहती थी। अक्सर उसकी आँखों की दहलीज पर आँसुओं के खण्ड-खण्ड हुए टुकड़े अटके रहते थे। उसकी हालत ने मेरे हृदय में सहानुभूति और संवेदना का संचार कर डाला। अब मैं रोज राउण्ड लेते वक्त उसके पास पड़ी कुर्सी पर बैठ जाती थी फिर उससे हालचाल पूछती वह खुलने लगी थी। मुझे डॉक्टर दीदी कह सम्बोधन भी करने लगी थी। उसने अपना नाम चम्पा बताया।
''चम्पा तुम हो कौन?'' पूछने पर वह व्यंग्य से मुस्कराई फिर रोते हुए बोली, ''दीदी! क्या आप अब भी मुझे नहीं पहचानी?''
''नहीं तुम मेरी पेशेण्ट हो यही पहचान है तुम्हारी।''
''नहीं दीदी आज मैं आपको पहचान बता ही देती हूँ। आप दिल्ली के डिफेंस क्वाटर्स में रहती थीं ना?''
मैंने कहा, ''हाँ, तुम्हें कैसे पता?''
''दीदी जब आप डॉक्टरी पढ़ रही थीं मैं बहुत छोटी थी। आपकी कॉलोनी के सामने झोपड़-पट्टी थी याद है आपको?'' मैंने फिर हाँ कर दी।
''मैं वहीं रहती थी जब आप कॉलेज जाती थीं डॉक्टरों वाला सफेद कोट पहनकर। तब मैं हजारों बार आपको देख चुकी हूँ। मेरा मन भी आपकी तरह डॉक्टर बनने का था पर जहाँ पेट-भर खाना मिलना कठिन हो वहाँ पढ़ना केवल सपना ही होता है। ऐसा सपना जो कभी हकीकत में नहीं तब्दील हो सकता।''
''तो तुम यहाँ कैसे पहुँच गई और इस धँधे में?'' मेरे प्रश्न ने उसके मर्म को आहत किया था। वह मुझे विचलित और बेचैन लगी।
फिर उसने खुद को संयत किया और भरभराई आवाज में कहा,''दीदी, मैं झोपड़-पट्टी की गरीबी में अभिशाप ही थी। पढ़ना तो मन में ही रह गया फिर घर के कामकाज और छोटे भाई- बहनों को बड़ा करने में मैं कब जवान हो गई पता नहीं चला। हाँ पता तब चला जब सामने के पक्के घर में रहने वाला वह लड़का आँखों से उतरकर दिल के दरवाजे पर दस्तक देने लगा। फिर हम छुप-छुपकर मिलने लगे।''
''कहाँ मिलते थे तुम?''
''दीदी, वो सामने जो खण्डहर था ना उसके पीछे।''
''अच्छा वो भी तुम्हें पसन्द करता था?''
''हाँ, शायद बहुत ज्यादा। अपनी जान से ज्यादा।''
''तो फिर तुमने उससे शादी क्यों नहीं की?''
''उसी से शादी के चक्कर में तो मैं यहाँ फँस गई।''
''कैसे?'' मेरा प्रश्न था।
याद करते हुए वह कहने लगी,''झोपड़-पट्टी की कॉलोनी का एक गुण्डा था कल्लू दादा। उसने मुझे उससे बात करते देख लिया था। एक दिन बोला, ''चम्पा, चल मैं तेरी शादी करवा दूँगा। वो मुम्बई गया है नौकरी करने, तेरे को भी बुलवाया है।'' मैं खुशी से पागल हो रही थी कि उसकी नौकरी लग गई है और अब वह मुझसे शादी कर रहा है। सच दीदी यह सपना इतना सुन्दर था कि मैं बावली हो गई थी। एक हफ्ते बाद मैं घर से भागकर कल्लू के साथ यहाँ आ गई इस भूल-भुलैया में, नरक जैसी ज़िन्दगी में। वो मेरे सपनों का राजकुमार तो यहाँ था नहीं। कल्लू ने यहाँ कोठे पर बेच दिया पाँच हजार रूपए लेकर बस।''
''बम्बई के इस बदनाम इलाके से निकलना तो बहुत चाहा पर दलदल में धँसती ही चली गई।'' सपनों की पनीली लकीरों ने उसकी स्मृतियों के घाव फिर कुरेद दिए। वह अपनी उस सपनों की दुनिया में भटकने लगी। खोई-खोई कहने लगी,''उम्र के पड़ाव पर मन के दरवाजे पर उस राजकुमार ने क्या दस्तक दी कि मैं एक दरवाजा खोलने के चक्कर में जीवन के सब दरवाजे बन्द कर आई और यहाँ रोज कोठे पर नया राक्षस दस्तक देता था। मैं दरवाजा खोलती और बन्द कर लेती थी फिर खोल देती थी। दस्तक-दर-दस्तक यह क्रम बढ़ता ही चला गया और मैं बिकती रही, बिकती रही। वह नहीं आया, कभी नहीं आया दरवाजे की थाप देने।''
''वो अब भी मन की दहलीज पर चुपके-चुपके कभी-कभी दस्तक देता है। मैं उसे आज तक नहीं भूली हूँ, वह तो शायद अब घर-बार संसार वाला होगा, पर मैं कोठेवाली बेघर-संसार हो गई और आज मौत के दरवाजे पर दस्तक दे रही हूँ मैं जानती हूँ कि मुझे एड्स है, मैं मरने वाली हूँ लेकिन जिसको पाने के लिए मुझे सब कुछ खोना पड़ा उसे तो पता ही नहीं है कि वह आज भी मेरे सपनों में आता है। इन सपनों की किरचियाँ मुझे घायल कर देती हैं। पर मैं अब भी सुनती हूँ मन की दहलीज पर उठती उन तरंगों को, जो ठहरी हुई ज़िन्दगी में भी हिलोरें लेती हैं।''

डॉ. रूचि बागड़देव
बी-304, श्रीरत्न अपार्टमेन्ट,
सुरधारा सर्कल रोड़,
अहमदाबाद-380054(गुजरात)