१३नवम्बर ९७ की गुनगुनी सी दोपहर निश्चय ही शुभ थी जब महिलाओं की रचनात्मक उर्जा को एक नईदिशा ,नए आयाम देने के उद्देश्य से इंदौर जैसे महानगर मे अनेकों किटी पार्टियों वाले क्लबों एवं सामाजिक संस्थाओं से अलग एक सृजनात्मक अभिरुचि की संस्था के रूप मे इंदौर लेखिका संघ की नींव रखी .आज लगभग १३साल से यह संस्था निरंतर संचालित होरही है .संघ की उपलब्धियों में सबसे अहम् यह की वे जो केवल लिखने की इच्छा करती थी वे भी इसके बेनर तले आज जम कर लिख रही है .पत्र -पत्रिकाओं मे स्थापित लेखन कर रही है ।







आज जब साहित्य हाशिये पर जा रहा है .इलेक्ट्रोनिक मिडिया के
बड़ते प्रभाव मे जब आम आदमी की साहित्य मे रूचि कम होने का खतरा बना हुआ है ऐसे संक्रमण काल मे साहित्य मे रूचि जगाने कही उद्देश्य लेकर चले थे सबके सहयोग ,सगठनं की भावना ही सफलता के मूल मंत्र मेरची बसी है .इस दृष्टी से लेखिका संघ समृध है यही हमारे उद्देश्य की सार्थकता भी है --------------------------स्वाति तिवारी







संस्थापक ,इन्दोर लेखिका संघ







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रविवार, 17 अक्तूबर 2010

कला-साहित्य

ठहरी हुई ज़िंदगी
कितना अजीब पेशा है डॉक्टरी का भी। इच्छा हो न हो यदि आप ड्यूटी पर आए हैं तो आपको अपनी इच्छा पर नहीं पेशेण्ट की हालत के अनुसार चलना होता है। सुबह से ही पवन से कह दिया था कि आज चाहे जो हो जाए वह घर समय पर पहुँचे मुझे शॉपिंग पर चलना है पर कहाँ उठ पाई मैं समय पर? पवन फोन पर फोन कर रहे थे। चार बार एस.एम.एस. भेज चुके थे। ज़रूर मजाक उड़ाएँगे मेरा, ''डॉक्टरनी मेडम शॉपिंग नहीं करनी थी तो खामखाँ मेरा दिन क्यूँ बिगाड़ा?''
''क्या करती मैं भी?''
क्लिनिक में उस रोज कुछ ज्यादा ही भीड़ थी। मैं थक गई थी। पेशेण्ट देखते-देखते यूँ तो हर रोज ही समझो यही हाल रहता है पर आज अपेक्षाकृत कुछ ज्यादा मरीज थे और मेरा पेशेण्ट देखने का समय भी समाप्त हो चुका था। एक घण्टा ऊपर हो गया था।
लास्ट पेशेण्ट बाहर बैठी थी। मैंने राहत की साँस ली थैंक गॉड चलो अब फुर्सत हुई। लास्ट पेशेण्ट उठकर मेरे पास आई। उसकी आँखों में अजीब-सी वितृष्णा दिखाई दी मुझे। ऐसी वितृष्णा तो उसी की आँखों में होती है जो खुद से ही नफरत करता है। उसके उठने-बैठने के ढंग में भी वह मुझे असामान्य दिखाई दे रही थी। उसने रजिस्ट्रेशन की पर्ची मेरे सामने रखी।
''क्या हुआ तुम्हें?''
वह कुछ बोल नहीं याचक की तरह मेरी तरह मेरी तरफ देखने लगी थी।
मैंने फिर कहा, ''क्या बीमारी है यह तभी बताया जा सकता है जब तुम अपनी तकलीफ बताओगी।'' उसने फिर साड़ी के पल्लू में चेहरा छुपा लिया। इस बार वह रो रही थी।
मैं उठकर उसके पास गई, ''अच्छा चलो उठो जाँच करती हूँ।'' वह उठकर बैड पर लेट गई फिर जो तकलीफ उसने बताई उसके लिए कई तरह के मेडिकल टेस्ट जरूरी थे। मैंने केस रिसर्च सेन्टर को रिकमेण्ड कर दिया था, मेडिकल जाँच के लिए। रिपोर्ट लेकर वह चार दिन बाद मेरे पास आई। जाँच की रिपोर्ट देखने के बाद मैंने ध्यान से उसके चेहरे की ओर देखा था, आज चेहरा निर्विकार था। फिर कुदरत किसी चेहरे पर तो नहीं लिखती कि वह कौन है? उसका पेशा क्या है? किस जात, किस धर्म की बेटी है? मैं उसके चेहरे पर कुछ नहीं पढ़ पाई। हाँ मेडिकल रिपोर्ट के कागज उसकी कहानी तो नहीं पर पेशा बयान कर रहे थे। मेडिकल जाँच में पाया गया कि वह औरत ''एड्स'' जैसी खौफनाक और जानलेवा बीमारी से ग्रसित है। मैंने उसे अस्पताल में उपचार के लिए भर्ती किया। अब वह थोड़ी राहत महसूस कर रही थी। एक सप्ताह तक तो उसके प्रति मन में उठने वाली प्रतिक्रिया अच्छी नहीं थी मेरा व्यवहार भी उसके प्रति उपेक्षापूर्ण ही था।
जैसे-जैसे लोगों को पता चली कि वह एड्स जैसी जानलेवा बीमारी से ग्रस्त है अस्पताल में नर्सों का भी उसके प्रति तिरस्कृत व्यवहार था। वे उसके पास ज्यादा देर तक रूकना पसन्द नहीं करती थीं। यूँ तो सब जानते हैं कि यह कोई ऐसी बीमारी नहीं जो छूने से फैलती है या पास जाने से ही आप को पकड़ लेगी पर एक अनजाने भय के आगे हर व्यक्ति डरता है। फिर यह तो बदनामी भी देने वाली बीमारी है। मरीज को खाना देने वाला कर्मचारी भी दूर से ही थाली सरकाकर चला जाता था। बीमारी के बारे में शायद अब उसे भी अहसास हो गया था। वह उदास और मायूस पड़ी रहती थी। अक्सर उसकी आँखों की दहलीज पर आँसुओं के खण्ड-खण्ड हुए टुकड़े अटके रहते थे। उसकी हालत ने मेरे हृदय में सहानुभूति और संवेदना का संचार कर डाला। अब मैं रोज राउण्ड लेते वक्त उसके पास पड़ी कुर्सी पर बैठ जाती थी फिर उससे हालचाल पूछती वह खुलने लगी थी। मुझे डॉक्टर दीदी कह सम्बोधन भी करने लगी थी। उसने अपना नाम चम्पा बताया।
''चम्पा तुम हो कौन?'' पूछने पर वह व्यंग्य से मुस्कराई फिर रोते हुए बोली, ''दीदी! क्या आप अब भी मुझे नहीं पहचानी?''
''नहीं तुम मेरी पेशेण्ट हो यही पहचान है तुम्हारी।''
''नहीं दीदी आज मैं आपको पहचान बता ही देती हूँ। आप दिल्ली के डिफेंस क्वाटर्स में रहती थीं ना?''
मैंने कहा, ''हाँ, तुम्हें कैसे पता?''
''दीदी जब आप डॉक्टरी पढ़ रही थीं मैं बहुत छोटी थी। आपकी कॉलोनी के सामने झोपड़-पट्टी थी याद है आपको?'' मैंने फिर हाँ कर दी।
''मैं वहीं रहती थी जब आप कॉलेज जाती थीं डॉक्टरों वाला सफेद कोट पहनकर। तब मैं हजारों बार आपको देख चुकी हूँ। मेरा मन भी आपकी तरह डॉक्टर बनने का था पर जहाँ पेट-भर खाना मिलना कठिन हो वहाँ पढ़ना केवल सपना ही होता है। ऐसा सपना जो कभी हकीकत में नहीं तब्दील हो सकता।''
''तो तुम यहाँ कैसे पहुँच गई और इस धँधे में?'' मेरे प्रश्न ने उसके मर्म को आहत किया था। वह मुझे विचलित और बेचैन लगी।
फिर उसने खुद को संयत किया और भरभराई आवाज में कहा,''दीदी, मैं झोपड़-पट्टी की गरीबी में अभिशाप ही थी। पढ़ना तो मन में ही रह गया फिर घर के कामकाज और छोटे भाई- बहनों को बड़ा करने में मैं कब जवान हो गई पता नहीं चला। हाँ पता तब चला जब सामने के पक्के घर में रहने वाला वह लड़का आँखों से उतरकर दिल के दरवाजे पर दस्तक देने लगा। फिर हम छुप-छुपकर मिलने लगे।''
''कहाँ मिलते थे तुम?''
''दीदी, वो सामने जो खण्डहर था ना उसके पीछे।''
''अच्छा वो भी तुम्हें पसन्द करता था?''
''हाँ, शायद बहुत ज्यादा। अपनी जान से ज्यादा।''
''तो फिर तुमने उससे शादी क्यों नहीं की?''
''उसी से शादी के चक्कर में तो मैं यहाँ फँस गई।''
''कैसे?'' मेरा प्रश्न था।
याद करते हुए वह कहने लगी,''झोपड़-पट्टी की कॉलोनी का एक गुण्डा था कल्लू दादा। उसने मुझे उससे बात करते देख लिया था। एक दिन बोला, ''चम्पा, चल मैं तेरी शादी करवा दूँगा। वो मुम्बई गया है नौकरी करने, तेरे को भी बुलवाया है।'' मैं खुशी से पागल हो रही थी कि उसकी नौकरी लग गई है और अब वह मुझसे शादी कर रहा है। सच दीदी यह सपना इतना सुन्दर था कि मैं बावली हो गई थी। एक हफ्ते बाद मैं घर से भागकर कल्लू के साथ यहाँ आ गई इस भूल-भुलैया में, नरक जैसी ज़िन्दगी में। वो मेरे सपनों का राजकुमार तो यहाँ था नहीं। कल्लू ने यहाँ कोठे पर बेच दिया पाँच हजार रूपए लेकर बस।''
''बम्बई के इस बदनाम इलाके से निकलना तो बहुत चाहा पर दलदल में धँसती ही चली गई।'' सपनों की पनीली लकीरों ने उसकी स्मृतियों के घाव फिर कुरेद दिए। वह अपनी उस सपनों की दुनिया में भटकने लगी। खोई-खोई कहने लगी,''उम्र के पड़ाव पर मन के दरवाजे पर उस राजकुमार ने क्या दस्तक दी कि मैं एक दरवाजा खोलने के चक्कर में जीवन के सब दरवाजे बन्द कर आई और यहाँ रोज कोठे पर नया राक्षस दस्तक देता था। मैं दरवाजा खोलती और बन्द कर लेती थी फिर खोल देती थी। दस्तक-दर-दस्तक यह क्रम बढ़ता ही चला गया और मैं बिकती रही, बिकती रही। वह नहीं आया, कभी नहीं आया दरवाजे की थाप देने।''
''वो अब भी मन की दहलीज पर चुपके-चुपके कभी-कभी दस्तक देता है। मैं उसे आज तक नहीं भूली हूँ, वह तो शायद अब घर-बार संसार वाला होगा, पर मैं कोठेवाली बेघर-संसार हो गई और आज मौत के दरवाजे पर दस्तक दे रही हूँ मैं जानती हूँ कि मुझे एड्स है, मैं मरने वाली हूँ लेकिन जिसको पाने के लिए मुझे सब कुछ खोना पड़ा उसे तो पता ही नहीं है कि वह आज भी मेरे सपनों में आता है। इन सपनों की किरचियाँ मुझे घायल कर देती हैं। पर मैं अब भी सुनती हूँ मन की दहलीज पर उठती उन तरंगों को, जो ठहरी हुई ज़िन्दगी में भी हिलोरें लेती हैं।''

डॉ. रूचि बागड़देव
बी-304, श्रीरत्न अपार्टमेन्ट,
सुरधारा सर्कल रोड़,
अहमदाबाद-380054(गुजरात)

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