१३नवम्बर ९७ की गुनगुनी सी दोपहर निश्चय ही शुभ थी जब महिलाओं की रचनात्मक उर्जा को एक नईदिशा ,नए आयाम देने के उद्देश्य से इंदौर जैसे महानगर मे अनेकों किटी पार्टियों वाले क्लबों एवं सामाजिक संस्थाओं से अलग एक सृजनात्मक अभिरुचि की संस्था के रूप मे इंदौर लेखिका संघ की नींव रखी .आज लगभग १३साल से यह संस्था निरंतर संचालित होरही है .संघ की उपलब्धियों में सबसे अहम् यह की वे जो केवल लिखने की इच्छा करती थी वे भी इसके बेनर तले आज जम कर लिख रही है .पत्र -पत्रिकाओं मे स्थापित लेखन कर रही है ।







आज जब साहित्य हाशिये पर जा रहा है .इलेक्ट्रोनिक मिडिया के
बड़ते प्रभाव मे जब आम आदमी की साहित्य मे रूचि कम होने का खतरा बना हुआ है ऐसे संक्रमण काल मे साहित्य मे रूचि जगाने कही उद्देश्य लेकर चले थे सबके सहयोग ,सगठनं की भावना ही सफलता के मूल मंत्र मेरची बसी है .इस दृष्टी से लेखिका संघ समृध है यही हमारे उद्देश्य की सार्थकता भी है --------------------------स्वाति तिवारी







संस्थापक ,इन्दोर लेखिका संघ







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सोमवार, 27 सितंबर 2010

इतिश्री
           चेतनाभाटी
 चेतनाजी लघुकथा का जाना पहचाना नाम हे हम यहाँ उनकी कुछ लघु कथाये दे रहे हे-संपादक







उन्हें विदा करने के बाद भी रवि-रीता की छवि आँखों से हटती न थी। काफी देर तो गेट पर खड़े हाथ हिलाते उन्हें जाते हुये, देखती रही फिर अंदर आकर सोफा, बैक ठीक किये,कुषन जमाये और चाय नाष्ते की कप प्लेटे उठाते हुये दरवाजे पर पड़े तिरछे पायदान को पैर से सीधे करते हुये किचन में आ गई। बचे हुये बिस्किट्स रेपर में लपेट कर डब्बे में डाले और बरतन सिंब में। और अखबार उठा कर लेट गई, बरामदे में पड़ी इजी चेयर पर। दोपहर में ही तो समय मिल पाता है कुछ लिखने-पढ़ने को, लेकिन नजरें अवष्य अखबार पर थी मगर दिमाग कहीं और।

कैसी तो जबरदस्त सुनामी आई थी, उनकी जिंदगी में कि देखते ही देखते सब गायब हो गया, जैसे कि कुछ था ही नहीं पानी ही पानी अंदर बाहर मन में आंगन में। आंखे गीली दिल भी भीगा।

रवि के पिताजी का अचानक ''देहान्त क्या हुआ उसकी तो मानों दुनिया ही उजड़ गई। वो ठाठ-बाट, रोब-दाब, ऐषो आराम सब गायब। मानों उन्हीं का रचा तिलिस्म था जैसे या माया जाल जादूगर का जो उन्हीं के साथ खत्म हो गया।

क्रिया कर्म आदि के कर्तव्य निवाह कर जब वह व्यापार-व्यवसाय सम्भालने अपने पिता के दफ्तर में आया और उनकी कुर्सी पर बैठा तो पता चला कम्पनी तो बड़े घाटे में है, लगभग दीवालिया होने की कगार पर।

पगड़ी की रस्म में जो पगड़ी उसके सिर पर रखी गई थी, वह उसे कांटों का ताज महसूस हुई। तो कहीं पिताजी भी तो इसी संदर्भ में अचानक ही ................उसे भी अपनी नैया डूबती जान पड़ी मगर जान बचाने को हाथ-पैर तो मारने ही थे। जल्दी-जल्दी उसने बहन की शादी निपटाई जैसे-तैसे और फिर सारी देन दारियाँ चुकाते-चुकाते तो पाई-पाई चुक गई। रत्न-आभूषण, बंगला, गाड़ी तक बिकते न देख सकी और माँ भी चल पड़ी, उसके पिता के पीछे। और वह अर्ष से फर्ष पर आ पड़ा।

शहर में जहाँ उसके कई बंगले थे और दर्जनों गाडियाँ, ढेरों नौकर-चाकर अब वहीं पर सिर पर एक अदद छत को तरस गया था। खैर कहीं से ढंूढ-ढांढ कर एक कम्पनी में नौकरी का जुगाड़ किया किराए के एक कमरे का भी पत्नी और दो छोटे बच्चों के साथ जिंदगी जैसे-तैसे चलने लगी।

फिर उस शहर से हमारा भी स्थानांतरण हो गया और हम भी अपनी-अपनी जिंदगी की आपाधापी में खो गये।

बच्चे के रोने की आवाज सुनकर मैं चौंक पड़ी और घबरा कर इधर-उधर देखा तो एक मोटर सायकल को तेजी से जाते पाया। ''उफ !'' मारे घबराहट के अपनी धौंकनी की तरह चलती सांसों को काबू करते माथे का पसीना पोंछा - ''उफ! कैसे-कैसे उटपटांग हॉर्न लगवा लेते हैं लोग, संवेदनहीन कहीं के। दिल की धड़कने अब भी तेज थी। फिर से लेट गई वहीं आराम कुर्सी पर, थोड़ा पानी पीकर। शाम ढल रही थी, बच्चे स्कूल से लौट रहे थे। कुछ देर यूँ ही पड़े रहने के बाद फिर अखबार उठा लिया और उलटने-पलटने लगी यूँ ही।

सूबह से सारे गृह कार्य निपटा कर फुसर्त हुई ही थी कि, दोपहर में अचानक कॉल बेल बजने से चौंकी - ''अब कौन होगा ? सोचते हुये दरवाजा खोला तो रवि-रीता सामने थे।

''अरे आप ! आप लोग'' - ज्यादा देर नहीं लगी पहचानने में, हालांकि अर्सा हो गया था, मिले हुये।

''आइए-आइए, अंदर आइए, आज अचानक कैसे याद आन पड़ी हमारी'' - कहते हुये मैंने दरवाजा पूरा खोल दिया।

''यहाँ एक विवाह समारोह में सम्मिलित होने आये थे। सोचा आप लोगों से भी मिलते चलें'' - अंदर आकर सोफे पर बैठे हुये दोनों एक साथ बोल पड़े - '' और सुनाइए क्या हाल-चाल है ? भाई साहब कैसे हैं ? ''

''बस सब ईष्वर की कृपा है। आपके भाई साहब दफ्तर गये हुये हैं, अब शाम गये ही आयेंगे''- कहते हुये मैं पानी ले आई और टे्र उनके सामने रख दी।

उन्होंने पानी पी कर गिलास मेज पर रखा और बातों का आनंत सिलसिला चल पड़ा। इतने दिनों तक किसने क्या-क्या किया, किस पर क्या-क्या और किस तरह गुजरीसब विस्तार से बताने लगे। आखिर वर्षों बाद मिले घनिष्ठ पारिवारिक मित्र जो थे। घूम घाम कर बात बच्चों पर आ टिकी, जैसा कि होता ही है।

''और सुनाइये बच्चे कैसे हैं ? क्या कर रहे हैं ?''- मैंने पूँछा।

''बस यही एक राहत है कि तमाम मुष्किलों, कठिनाइयों के दौर के बावजूद बच्चे अच्छे निकले। पढ़-लिख कर दोनों जॉब में हैं'' - रीता बोली।

''उनकी पढ़ाई के लिये मुझे क्या-क्या नहीं करना पड़ा। रात-दिन मेहनत की, जुता रहा कोल्हू के बैल की तरह, पढ़ाई का खर्चा उठाने को, कितने पापड़ बेले''- अपनी पिछली कठनाईयाँ, बुरा दौर याद करते हुये रवि के तो आँसू ही छलक पड़े।

मैंने तुरंत ढाढस बंधाते हुये कहा - ''अरे, तो क्या हुआ अंत भला तो सब भला। आखिर इतने कठिन परिश्रम का, सब्र का फल भी तो मीठा मिला न। दोनों बच्चे अपनी लाइफ में सेटल हो गये और क्या चाहिये ? ''

''हाँ जी, यही कमाई है, हमारी जीवन भर की। दोनों अच्छी कम्पनी में लगे हैं एम.बी.ए. करने के बाद। अच्छे पैकेज मिल गये दोनों को। बेटा महीने के लगभग चालीस हजार कमाता है और बिटिया पच्चीस-तीस के बीच'' - रीता गर्व से बोली।

''अरे वाह! तब तो आप षिफ्ट कर गये होंगे ? उस एक कमरे वाले किराये के घर से जहां टॉयलेट तक कॉमन था'' - मैंने उत्साह से भर कर पूँछ लिया।

''नहीं अभी तो हम वहीं हैं। अब बच्चे तो दोनों चले गये अपने जॉब के कारण। अब हम दोनों ही तो हैं, तो काफी है, ठीक है अब क्या करना है। गुजर हो ही जाती है, उस एक कमरे में। पहले तो चार लोग रहते थे, अब हम दो ही हैं तो कोई कठिनाई नहीं। रवि अपना काम कर ही रहे हैं, मैं भी करती रहती हूँ घर में ही कुछ न कुछ व्यस्त रहने के लिये और कमाई भी हो ही जाती है, कुछ इस तरह''-रीता बोली।

''वह तो ठीक है, लेकिन अब जब दोनों बच्चे ठीक ठाक कमाने लगे हैं तो उन्हें मिल कर अपने माता-पिता के लिये एक मकान की व्यवस्था तो करनी चाहिये न आखिर इतना कमा रहे हैं दोनों। एक छोटा-मोटा फ्लेट तो दिलवा ही दें, ताकि आप लोग सलीके से तो बिता सकें शेष जीवन। कुछ तो कठिनाइयाँ कम हों आप लोगों की। इतना कमा रहे हैं तो क्या मुष्किल है ? आधी-आधी तनख्वाह भी हर महीने बचाई जा सकती है। अभी तो शादी भी नहीं हुई है दोनों की । तो इस तरह साल भर में एक छोटे फ्लेट के पैसे तो जमा हो ही सकते हैं - बातें करते-करते मैं चाय नाष्ते की टे्र सजा लाई थी तो उनकी ओर बढ़ा दी।

प्लेट से बिस्किट उठाते हुये, रीता बोली- '' नहीं, अभी कहाँ बचा पाते हैं, उनके अपने भी तो खर्चे हैं ? ''

आश्चर्य से मेरी आँखे फटी जा रही थीं -''इतना वेतन ! और बचा नहीं पाते ? आखिर इतना-कितना खर्च कर सकते हैं, अकेले ? जबकि अभी कोई पारिवारिक जिम्मेदारी भी नहीं है। विवाह तो हुआ नहीं है''।

''नहीं तो कम्पनी के हिसाब से मेंटेन भी तो करना पड़ता है बेटे को, फ्लाइट से आना-जाना, पहनावा, रहन-सहन आदि तो खर्च होता ही है। बिटिया तो आधी तनख्वाह कपड़ों पर ही खर्च कर देती है। अब हम तो कुछ कर पाये नहीं। पढ़ाई का खर्च ही मुष्किल से वहन कर पाते थे बाकी तो जैसे-तैसे ही चलता था। कभी एक जिन्स तक नहीं दिलवाई, बच्चों को तो अब वे स्वयं अपनी इच्छाएं पूरी कर रहे हैं''। - रीता ने बच्चों का पक्ष लिया, जैसा कि साधारणतया मांए करती हैं, मगर लाचारी उनके चेहरे पर टपकी पड़ती थी।

''वह तो ठीक है कि वे अपनी इच्छाएं पूरी करें, लेकिन माता-पिता का भी तो ख्याल रखें जिन्होंने अपनी सारी जिन्दगी होम कर दी, उनके जीवन को संवारने में'' मैं कहना तो चाहती थी मगर फिर कहा नहीं सोचा जब वे लोग खुष हैं ऐसे ही तो हमें भी क्या करना है ? वे जाने उनके बच्चे जानें, तो उनकी हाँ में हाँ मिलाने लगी- ''हाँ, जी हाँ बच्चों की भी तो अपनी इच्छाएं हैं''।

इस बीच रवि बिल्कुल चुप बैठे रहे। उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। फिर कुछ इधर-उधर की बातें हुई और वे दोनों चले गये, लेकिन मैं उलझ कर रह गई।

''ट्रिंग े े े े३ण्ण्'' कॉलबेल बजी और ''ये'' आ गये।

''रवि और रीता आये थे। ''मैंने तुरंत ही समाचार दिया।

''अच्छा! चले भी गए ! रूके नहीं मेरे लिए ? कैसे हैं दोनों ? ''इन्होंने'' हर्ष मिश्रित आष्चर्य के साथ प्रष्नों की झड़ी लगा दी।

''वे'' कपड़े बदलने लगे और मैं उनके लिये चाय बनाते हुये सब विस्तार से बताने लगी। अंत में चाय-नाष्ता टेबल पर लगाते हुये बोल ही पड़ी - '' पता है अब भी उसी किराये के एक कमरे में रह रहे हैं, उनकी कठिनाईयों का अंत नहीं। इतनी मुष्किलों से बच्चों का जीवन संवारा और बच्चे हैं कि कुछ सोचते ही नहीं उनके लिये बस अपने ही शौक पूरे करने में लगे हैं। अरे कम से कम एक ठीक-ठाक मकान की व्यवस्था तो कर ही दें, ताकि कुछ तो आराम मिले माता-पिता को। कोई छोटा-मोटा फ्लेट ही सही, न सही अपना किराये का ही सही, लेकिन वे तो .................''।

''अरे तुम भी क्या ले बैठी ! अब जमाना ही ऐसा है, उदारवाद और उपभोक्तावाद का ! यानी उदार बनो अपने लिये और खूब उपभोग करो। उदार भोग स्वयं के प्रति। ''कुर्सी खिसका कर ''ये'' बैठते हुये बोले।

''लेकिन ..........मैंने फिर कोषिष करनी चाही''।

''लेकिन-तेकिन कुछ नहीं। किस दुनिया में है मेड़म आप ? ये कोई आपके प्रेमचंद के ईदगाह की दुनिया नहीं है कि, जब बच्चा अपना पेट काटकर मौज-मजे भूल कर मेले में खर्च करने को मिले पैसों से एक चिमटा खरीद लाए अपनी दादी की फिक्र करते हुये कि, रोटी सेंकते समय उनके हाथ जल जाते हैं। बच्चे अब इतने मासूम नहीं रहे। वे सबसे पहले अपने मौज-मजे के लिये सोचते हैं, फिर उसी मौज में ऐसे डूबते हैं कि किसी और के लिये सोचने तक का समय नहीं रहता। आज-कल तो बच्चे पहले तो खूब खर्च करवा कर पढ़ते जाते हैं, ये भी करना है वो भी करना है, कॉलेज भी कोचिंग भी और भी न जाने क्या-क्या और फिर जब सब हो जाये तो निकल लेते हैं। अब्रॉड नहीं तो यहीं कहीं दूरस्थ शहर में, और माता-पिता खड़े देखते ही रह जाते हैं, ठगे से हकबकाए से। पहले की तरह थोड़े ही कि जल्दी से जल्दी पढ़ाई पूरी कर बच्चे कुछ बन जाना चाहते थे, ताकि माता-पिता और घर परिवार की देखभाल कर सकें। अरे यहाँ तक कि स्वयं को भी झोंक देते थे। अब हमारे बरेली बाले फूफा को ही स्वयं को ही लो जो स्कूल की पढ़ाई के बाद ही फौज में भर्ती हो गये, सिर्फ इसलिये कि, उनकी सारी तनख्वाह माता-पिता को मिल सके। अपनी जान ही दांव पर लगा देते थे। उस समय तो युद्ध भी खूब होते थे, लेकिन नहीं, चिंता थी तो बस घर परिवार की माता-पिता की। अब तो बच्चे बस मातृ-पितृ दिवस पर ही एकाध कार्ड या अखबार द्वारा संदेष देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं'' - ''इन्होंने'' चाय का घूँट भरा मुझे लम्बा डोज पिला कर     



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गुरुवार, 23 सितंबर 2010

एक नया रिश्ता




डा. स्वाति तिवारी



'' हॉल के बीच वीच वाले खम्भे पर गेंदे के फूलों की लड़ियाँ बॉधवा लेते हैं, क्यों काका ? ''

'' हॉ बिटिया, अच्छे लगेंगे । ''

'' यहाँ रंगीन बल्बों की झालरें ठीक रहेंगे,और गैट के पास हरे-भरे पौधों से सजावट करवा देते हैं । ''

'' बिटिया, वो टेंटवाला आया है, लाइट कितनी लगवानी है ?'' रामू काका ने अनुभूति को बताया ।

'' आई काका,वहीं आकर बताती हॅू । ''

'' ठीक है बिटिया, जल्दी,जल्दी आकर बता दो ये जल्दी मचा रहे हैं । ''

'' हाँ, अब बताइए ! देखिएं उपर शामियाने में बडेत्र बल्ब और गार्डन के बाउण्ड्री वाले पौधों पर और इन सभी प्लांट्स पर टिमटिमाते लट्टेू ।''अनुभूति ने टेंटवाले से सजावट व लाइटिंग का निर्धारण सा करते हुए कहा ।

'' मैडम, यह तो बहुत कम हैं । पिछली बार तो इससे ज्यादा लाइट लगवाई थी । '' टेंट हाउस वाला अपना बिजनेस देख रहा था ।

'' नहीं.........नहीं..........माँ को ज्यादा जगमगाहट पसंद नहीं हैं ।''

'' अच्छा ..........जैसा आप ठीक समझें, पर वेलकम वाले गेट पर रोशनी जरूरी होती है । अगर आप कहें .........''

'' नहीं, नहीं । बस, बहुत है ।'' अनुभूमि ने झुंझलाते हुए कहा ।

'' अरे अनुभूति बेटा,प्रवेशद्वार पर कलश कौन संभालेगा ? बड़ी बुआ पूछ रही थीं । एक वे ही तो आई थी ं इस शादी में, अनुभूमि की मदद करने ।

'' मैं संभाल लूंगी बुआ ! ''अनु ने बच्चों से उत्साह के साथ कहा ।

''पर बेटा, क्या ऐसा करना ठीक रहेगा ? बुआ ने संशय के साथ पूछा था । वही व्यवस्थाए सब कुछ वही है । वैसा का वैसा, किसी चौखट पर बंधे चित्र की तरह, पर पात्र बदल गए हैं । हॉल के उसी लैम्प के प्रकाशवृत्त के नीचे आज अनुभूति खड़ी है, कल जहाँ माँ खड़ी थी । तपती धूप में कलसाता चेहरा लिए । गेस्ट हाउस के सामने वही छोटा सा बंगला है, जहाँ मधुमालती की झूलती लता थी,जूही और रातरानी से महकता एक छोटा सा घर, जो खुद भी महकता था, कभी अनुभूति की बातों से तो कभी पापा की बाँहों में माँ की सॉसों से । आज भी वहीं बँगला है, बीस वर्षो के अन्तराल के साथ, जहाँ मधुमालती की लता भी है और जूही एवं रातरानी की खुशबू भी । पर यदि नहीं है तो बीस वर्षो से वहाँ जीवन की सजावट नहीं है । इसलिए नहीं है,क्योंकि निगल गया था मृत्यु का अजगर उन बाँहों को, जो माँ और बेटी को अपने में समेट लेती थीं । हाँ, पापा के ना होने का अहसास पल-पल महसूस होता था उन्हें ।

सूनापन सब तरह से लगता रहता था, कभी माँ की सफेद साड़ी में, सूने रह गए खाले गले में हाथों की कलाई में । पर जीवन है जिसे इन सबके बगैर भी वे दोनों जी रही थी । क्यों........और कैसे, यह अलग बात है, पर जी रही थीं वे दोनों, अपनी पूरी जिवीविषा के साथ । एक दूसरे का सहारा बनकर

एक ऐसी कहानी जो कहानी है ही नहीं, क्योंकि इसमें घटनाओं और पात्रों का स्थूल या सूक्ष्म अंकन महत्वपूर्ण नहीं है । यह किस्सागोई भी नहीं है, ना ही यह बयानबाजी है । पर इसमें जो है, जीवन का मर्म है, जीवन मूल्य है और संवेदना का स्पर्श है ।

जे दृश्य अभी सामने था, वह शादी की तैयारी का है । एक ऐसे विवाह का, जिसको बेटी सम्पन्न करा रही है, अपनी माँ की शादी करवा रही है । वह जुटी हुई है जूझते हुए उन तमाम विरोधों और तानों से, जो परिवार के ही लोग दे रहे हैं । ऐसे लोग, जो उसके अपने कहलाते है, दादी, काका-काकी, नाना-नानी, माम जैसे कितने ही रिश्ते हैं जो उसकी पीड़ा से दुखी तो थे, पर पीड़ा से मुक्त होने देना नहीं चाहते थे ।

क्या रिश्ते वही होते हैं जो खून के संबंधों से जुडे होते हैं ? क्या वे रिश्ते नहीं हैं जो माँ के सहकर्मी अकाउण्ट सेक्शन वाले गुप्ता अंकल से हैं । माँ की बुजुर्ग सहकर्मी मिसेज जोशी ने जो उन्हें दिए हैं अनुभूति उन्हें भी नानी कहती है । सब खुश हैं, अनुभूति की मदद कर रहे हैं । इसी रिश्तों की नई परिभाषा ने अनुभूति में दुगने उत्साह का संचार कर डाला था जब अनुभूति ने गुप्ता अंकल से माँ की शादी की बात की थी, उसने अंकल से राय ली थी ।

अबकी बार जब अनुभूति मुम्बई से इंदौर आई तो उसे माँ में एक बदलाव महसूस हुआ था । माँ चुपचाप रहती हैं घर में । उदास माँ अनुभूति को अच्छी नहीं लगती । एक दिन माँ ने उसे बताया कि घर में बोलने की आदत ही नहीं रही, किससे बोलू ? बातचीत के अंतरंग क्षणों में एक रात माँ रो रही थी । यह कहते हुए कि अब उन्हें यहाँ अकेले रहना अच्छा नहीं लगता । '' अनुभूति, जानती है तू, आजकल हमारे जो नए बॉस आए हैं ना, वे बिलकुल तेरे पापा जैसे लगते हैं । ''

''अच्छा दिखने में ? ''

''हाँ । वही हाइट,हेल्थ,वैसा ही लुक । काम में भी वही स्टाइल है ।''

'' तुमसे बातें हुई ? ''

''हाँ, कभी-कभी । ''

''शादीशुदा हैं ? कैसी है उनकी पत्नी उनके बच्चे? अनुभूति को जिज्ञासा हुई।

''उनसे बात करने पर मुझे लगता है, जैसे मैं उन्हें पहले से जानती हॅू । माँ के चेहरे पर एक ठहरा हुआ शान्त भाव था ।

''पत्नी, बच्चों से मिली क्या ? ''

''नहीं रे..........बिचारे के बच्चे तो अमेरिका में सेटल हैं और पत्नी तलाक ले गई है । ''

''अच्छा......... ?''

'' माँ, क्या तुम्हें वे पसन्द है ?'' अनुभूति ने सीधा सपाट प्रश्न कर डाला ।

''हट पगली ! इस उम्र में क्या पसंद ? ''

अनुभूति अगले दिन गुप्ता अंकल से मिल थी '' अंकल, माँ एकदम अकेली हो गई है, मेरी शादी के बाद से । ''अनुभूति ने बात आरंभ की ।

'' हाँ बिटिया ! जानता हॅू, भाभी एकदम अकेली हो गई हैं, पर लगता है वे अभी भी उसके साथ है ।''

'' हाँ अंकल ! वे अब भी पापा की उपस्थिति को महसूस करती हैं, क्योंकि पापा उनके मन में हैं । उनकी यादों में है, उनकी बातों में है ।'' अनुभूति ने नम आँखों के कोर पोंछे थे ।

''अनुभूति बेटा, जीवन यादों से लम्बा नहीं होता, छोटा हो जाता है । रूक जाता है उसमें समय का प्रवाह । '' गुप्ता अंकल कहने लगे ।

'' जी............ मैं समझती हॅू इस ठहराव को । अपने जन्म से लेकर विवाह तक मैं भी उसी ठहराव का हिस्सा थी । जीवन का प्रवाह महसूस ही नहीं हुआ था, पर जीवन चलने के साथ चलता है । यह बात शादी के बाद ही समझ पाई हॅू । पर माँ अब भी वहीं हैं । वह यह बात समझना ही नहीं चाहतीं । '' अनुभूति के स्वर में गंभीरता थी,'' अंकल, माँ घर में एकदम चुपचाप रहती हैं ।''अनुभूति ने समस्या रखी तो आश्चर्य हुआ गुप्ता जी को ।

'' तुम्हें सुनकर आश्चर्य होगा अनुभूति,भाभी दफ्तर में लगातार बोलती हैं । स्टाफ के लोग तरस खाकर सुनते हैं, उनके अतीत को, पर कब तक ?''

''पर ऐसा कैसे हो सकता है अंकल ? ''

''उन बातों को रहने दो अनुभूति ! दरअसल अब उनमें अलग खड़े रहने की ताकत कम होती जा रही है । यादों के वे प्रसंग उन्हें बार-बार वहीं ले जाते हैं जहाँ दर्द ही उनके निकट होता है । आज दर्द के इतने निकट न होने पर भी इतनी जल्दी और बार-बार वहीं कैसे पहुंच जाती है वे ?'' अंकल माँ को लेकर काफी चिन्तित लगे ।

'' ऐसा क्यों अंकल ? कहीं माँ मेण्टल प्रॉब्लम में तो नहीं हैं वे डिप्रेशन में तो नहीं ? '' अनुभूति परेशान हो उठी ।

'' बेटे, अभी तो वे डिप्रेशन में नहीं हैं पर शायद लम्बे समय तक अकेली रहेंगी तो हो सकता है । अक्सर मैं महसूस करता हॅू, जाने कैसे नए सिरे से भाभी के फफोले रिसने लगते हैं ! बोलते हुए वे कभी-कभी कातर हो जाती हैं । अतीत की दारूणता मेंे उनके लाचार हाथ बढ़ने लगते हैं । उन्हें स्मृति में भटकते हुए देखते हैं सब लोग । भाभी के जीवन में दर्द के आवेश का रॅूंधा हुआ क्षण बार-बार आ जाता है । मैं समझता हॅू इसका कारण यह है कि पहले उनके पास तुम थीं । उनके जीने का सहारा, उनके भविष्य के रूप में । उनके जीवन का मकसद थीं तुम । घर आबाद था । तुम उनके अकेलेपन को बांटती थीं, रिक्तता की पूर्ति बनकर । वे तुमसे इतना बोल - बतिया लेती थीं कि उनके मर के, उनके दिलो-दिमाग के सभी प्रवाह तुम्हारे रूप में गतिवान थे । वह भी मनुष्य हैं और एक स्त्री जो भावनाओं,विचारों और संवेदनाओं से भरी हुई, जिसका आदान-प्रदान एक सहज प्रवृत्ति है । उनका वही प्रवाह एकाकी हो गया, तुम्हारी शादी के बाद । घर मंें अकेली संवादविहीन रहती हैं, इसीलिए दफ्तर में उसकी पूर्णता ढूंढती हैं । पर लोग कतराने तथा उकताने लगें,यह तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा ।''

'' जी अंकल, क्या हम माँ को अकेलेपन से बचा सकते हैं ? अंकल मैं सोचती हॅूं हम माँ को विवाह के लिए तैयार करें । ''

''पर इस उम्र में ?

'' अंकल, आपके ब्रांच मैनेजर मिस्टर शर्मा भी तो तलाकशुदा हैं ।क्यों ना उनसे बात की जाए ? ''

'' पर क्या वे तैयार होंगे ?

मैं बात करना चाहती हॅू उनसे, अभी इसी वक्त । ''

'' बेटे, बात मैं कर लूंगा , पर क्या भाभी तैयार हो जाएगी ? क्या तुम्हारे पति, सास ससुर समाज इस बात को स्वीकारेंगे ?

'' मैं सबको समझा लूंगी । दुनिया कहाँ से कहाँ पहुंच गई है । ''

'' बहुत अच्छा बेटा ! तुम धन्य हो, माँ के बारे में इतना सोचती हो । भाभी चाहती तो 20 वर्ष पहले, जब वे युवा थीं तभी दूसरी शादी कर सकती थी ं। पर तब तुम थीं, एक दायित्व की तरह । पर अब भी वे मात्र बयालीस वर्ष की हैं, एक लम्बा अकेलापन उनके सामने है, हम बचा सकते हैं उन्हें । ''

घर जाकर अनुभूति माँ से बात करती रही और उसने उन्हें मिस्टर शर्मा के प्रति सकारात्मक सोचने पर मजबूर कर दिया । अनुभूति को लगा था, माँ बुरी तरह रिएक्ट करेंगी । पर माँ मान गई । नहीं माने थे दादा-दादी,नाना-नानी । केवल बड़ी बुआ ने हाँ की थी ।

अनुभूति ने माँ के विवाह की तमाम जवाबदारी ले ली । अनुभूति के विवाह के वक्त मैने महसूस किया था कि अनुभूति और उसकी माँ के अन्दर कितनी ही इच्छाएं दबी-कुचली हुई हैं । माँ में भावनात्मक प्रवाह को बेटी की खुशी बनकर प्रवाहित होते देखा था मैने ।

'' अरे इला.........ये देख, लाल साड़ी कितनी सुन्दर है । '' वे अपने तन पर पल्ला डाल शीशे में देख लेती हैं उनके चेहरे पर एक अजीब हलचल होते देखी थी मैने ।

'' तेरे अंकल होते ना तो जरूर मैं यह साड़ी पहनती शादी में । '' उनके मन में एक उदासीनभरे इससे पहले ही उन्होंने उसे पैक करवा लिया अनुभूति के लिए ।

लल,पीले,हरे-भरे रंग उनके चेहरे के उतरे रंग को बदरंग ना करें, इसीलिए उन्होंने वे तमाम शोख रंग बेटी के लिए ले लिए । मैने टोका था उन्हें'' आजकल इतने शोख कलर नहीं चलते । ''

अनुभूति ने रोक दिया था मुझे, माँ को टोकना मत, बरसों से दबे रंग उनमें जागे हैं । उनके अन्दर के उत्साह को चोट लगेगी यह जानकर कि वे दुनिया से पिछड़ रही हैं । ''

मैं अवाक थी, बेटी के मन में माँ के प्रति इस लगाव और समझ को देखकर । उन माँ बेटी को मैने पूरे विवाह उत्सव में खुश होते देखा था, और पाया था वहां 20 वर्ष पहले अतीत बन चुका एक व्यक्ति हर पल मौजूद था । एक पति, एक पिता को यॅूं हर साँस के साथ उनके दिल में धड़कते पाया था मैने जो लगातार जिन्दा रहा उनके ख्वाबों में । उस चमकको आँखों में आते-जाते देखा है मैंने कभी वह साड़ी के कलर में याद आ जाता तो कभी भोजन की लिस्ट,मिठाई तय कर रहा होता, तेरे पापा को यह कलर पसन्द था, अमन का सूट इसी कलर का लेते हैं, क्यों अनुभूति !

''हाँ ममा, पापा को टाई में रेड कलर पर ज्यामेट्रीवाला डिजाइन पसन्द था ना, बस वही ले लो ।

इस तरह वे हर जगह मौजूद थे । पर कब तक ?अनुभूति की पसन्द अमन की पसन्द में बदल गई थी । अनुभूति का बचपन विक्की में लौट आया था माँ, मिसेज वैद्य उम्र के अदृश्य दस वर्ष और आगे बढ़ती चली गई । तमाम अटकलों,विवादों और ना नुकर के बाद उन्होंने अनुभूति और अमन की इच्छा कहकर पुनर्विवाह स्वीकारा था । ढलती उम्र में एक नए रिश्ते का सच ।

माँ की हाँ होते ही अनुभूति और अमन अचानक बड़े हो गए थें, विवाह का दायित्व निभाने को तैयार । एक साधारण समारोह में विवाह सम्पन्न हुआ । पूरा स्टाफ शादी में शामिल हुआ था । हर कोई रिश्ते को अपनी नजरों से तौल रहा था । पर मुझे लगा, कितना पवित्र था वह रिश्ता,जिसे बड़े होते बच्चों ने रोपा था । अनुभूति को मिले थे नए पिता और विक्की को पहली बार नाना । एक सम्पूर्णता पा जाने की आत्मतृप्ति थी सबके चेहरे पर ।

मिसेज वैद्य के मन से नए परिवार को लेकर संशय के सभी बादल छँट गए थे ''अनुभूति, बहुत सुलझे हुए हैं मिस्टर शर्मा,बिल्कुल तेरे पापा की तरह । ''

विवाह के बाद सब कुछ सामान्य-सा हो चला था । अनुभूति और अमन ने उन्हें पहाड़ों पर घूमने और देवी -दर्शन को भेजा था '' मम्मा आप दर्शन कर आइए, मैने मन्नत मानी थी । ''

हफ्ते भर की यात्रा थी । लगभग रोज ही अमन अनुभूति से वे फोन पर बात करते थे । पर ईश्वर जाने क्या चाहता था । लौटतिे वक्त उनकी कार का एक्सीडेंट हो गया था । मिस्टर शर्मा एक नर्सिंग होम में एडमिट थे । मिसेज शर्मा...........।

सुबह-सुबह अनुभूति का मेरे पास फोन आया था '' इला, माँ और पापा का एक्सीडेंट हो गया है ।'' वह रूआँसी आवाज में इतना ही बोल पाई और रूलाई फूट पड़ी थी ।

''क्या ?''

'' हाँ इला, एक अस्पताल से फोन आया है, पापा सीरियस है और माँ....। तुम ताला तोड़कर घर खोल लो तैयार रखना मैं लेकर आती हॅू ।

श्रात तक अनुभूति और अमन लेकर लौटे थे माँ की डेड बॉडी । तमाम व्यंग्यों,तानों, उलाहनों के बावजूद एक दृढ़ निर्णय लेने वाली अनुभूति को यॅूं बिलखते देखा था मैने । जीवनभर अजीज रही माँ, बचपन से लेकर आज तक सब कुछ रही माँ, एक दोस्त, एक संरक्षक सभी कुछ थी । वहीं आज केवल डेड बॉडी बन गई थी । उसने कितने चाव से माँ के जीवन में रंग भरना चाहे थे, पर विधाता.......।

अनुभूति और अमन माँ का अंतिम संस्कार करने की तैयारी जल्दी-जल्दी कर रहे थे ।

माँ को सुहागन के वेश में तैयार किया गया । सजी सँवरी उनकी देह, उनका चेहरा इतना सजीव लग रहा था कि लगता है । ' पर सब-कुछ शान्त था । वह शान्त सौम्य चेहरा ! उस चेहरे को मैं कभी नहीं भूल पाई । क्या था उस चेहरे में ? आत्मतृप्ति थी, आत्ममुग्धता थी, सुहागन की पवित्रता थी, एक संतृप्त चमक और और असीम शांति थी ।

अनुभूति और अमन रात को ही फिर चले गए । लौटे थे पन्द्रह दिनों के बाद पापा को नर्सिंग होम से लेकर । एक माह रही अनुभूति उनके पास ।वह दिन है और तब से लेकर आज का दिन है, वह नया रिश्ता अब भी महक रहा है । विक्की अब नवीं कक्षा में है । अनुभूति के दो बच्चे और हैं, एक बेटी पारूल और छोटा बेटा राहुल ।

गर्मी की छुटि्टयों में मिस्टर शर्मा का बंगला पूरे समय चहकता है । गॅूंजती है वहॉ विक्की, पारूल और राहुल की किलकारियाँ ।

''नानाजी, मैं पिज्जा खाउँगा । '' यह शायद विक्की है ।

''नानाजी, मुझे घोड़ा-घोड़ा खेलना है । '' और मिस्टर शर्मा राहुल को पीठ पर बैठाकर बाहर के लॉन में घोड़ा बन जाते हैं ।

''पापा,क्या कर रहे हैं आप ? अनुभूति डाँटती है उन्हें ''ये कोई उम्र है, इस तरह घोड़ा बनने की । ''

''कुछ नहीं अनु, बच्चों के साथ खेल ही रहा हॅू । ''

''चलो उतरो रे ! उधम-मस्ती नहीं चलेगी । पापा, सेहत का कुछ तो खयाल रखिए । आपने ब्लड प्रेशर की गोली ली ? '' यह मायके आई मिस्टर शर्मा की बिटिया अनुभूति की चिन्ताभरी आवाज है ।

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डा. स्वाति तिवारी

पता ईएन 1/9 चार ईमली

भोपाल (म.प्र.)